भारत
Trending

62 साल पहले महिलाओं के ‘वर्क फ्रॉम होम’ से शुरू हुआ था लिज्जत पापड़ का सफर, पढ़ें रोचक कहानी :

संगबाद भास्कर न्यूज़ डेस्क : हम और आप जिस लिज्जत पापड़ को बहुत शौक से खाते हैं। उसके बनने के कहानी बहुत ही दिलचस्प है।

क्या आप जानते हैं कि इस पापड़ को बनाने की शुरुआत कुछ महिलाओं के ग्रुप ने किया था, जो बाद में पूरे देश में पूरे देश में इस कहर प्रसिद्ध हो गया।दरअसल कोरोना वायरस महामारी आने के काफी पहले से ही लिज्जत पापड़ बनाने वाली महिलाएं घर से काम कर रही थीं। इसकी शुरुआत कुछ ऐसे हुई कि लगभग 62 साल पहले जसवंतीबेन पोपट और छह स्थानीय महिलाएं मुंबई के गिरगांव में एक छत पर इकट्ठा हुईं और कैसे अपने परिवार की आय बढ़ाई जा सकती हैं, इस पर विचार करने लगीं। वे सभी महिलाएं थोड़ी बहुत ही पढ़ी-लिखी थीं, लेकिन वो ये जानती थीं कि किसी घर को कैसे चलाया जाता है। यहीं इन महिलाओं ने साथ मिलकर पापड़ बनाने का काम शुरु करने का फैसला किया।

इन सभी महिलाओं में से हर एक महिला पापड़ बनाने से जुड़ा एक-एक सामान (जैसे- उड़द दाल का आटा, काली मिर्च, हींग, मसाला) खरीदती और पापड़ बनाने में जुट जातीं। इस तरह से उन्होंने पापड़ बनाने का काम शुरु कर दिया और एक टीम बनाकर अपने आस-पड़ोस में ही इसे बेचने लगीं। पहली बार में उन्होंने इसके कुल चार पैकेट बेचे और 8 आने यानि 50 पैसे की कमाई की। इसके अगले दिन उन्होंने दोगुना पापड़ बनाए और पहले दिन से दो गुना अधिक कमाई भी की। वो सभी महिलाएं रोज के मुनाफे को आपस में बराबर-बराबर बांट लिया करती थीं।

जल्द ही उनसे और भी महिलाएं जुड़ने लगीं और अगले तीन महीनों में, कम से कम 200 महिलाएं पापड़ बनाने का काम करने लगीं।उन्होंने पूरे शहर में इसके कई ब्रांच बना दिए और बाद में दूसरे राज्यों में इसका विस्तार किया। इतना ही उन्होंने युवा महिलाओं को भी इससे जोड़ा, उन्हें नौकरियां दी और पापड़ बनाने की ट्रेनिंग भी दी। छह साल बाद उन्होंने इसे एक कंपनी के रुप में रजिस्टर करवा लिया।

आज श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ भारत की सबसे पुरानी महिला सहकारी समिति है और यह 17 राज्यों में 45,000 महिलाओं को रोजगार भी देता है। अब यह 1,600 करोड़ रुपये की एक कंपनी है, जो सालाना 400 करोड़ से अधिक पापड़ के अलावा हाथ से बनी चपातियां, मसाले और डिटर्जेंट पाउडर बेचती है।

यह अभी भी बिना किसी औपचारिक कौशल वाली महिलाओं को रोजगार प्रदान करता है और मुनाफे को उनसे साझा करता है। यह तकनीकी रूप से भी लगातार आगे बढ़ा है। इसे शुरु करने वाली जसवंतीबेन पोपट जो अब 91 साल की है, उन्हें इस साल पद्म श्री से सम्मानित भी किया गया था। लिज्जत पापड़ की सफलता की कहानी अब जल्दी ही आशुतोष गोवारिकर द्वारा निर्देशित एक फिल्म के जरिए सभी के बीच आने को तैयार है।

इस सहकारिता की अध्यक्ष स्वाति पराड़कर कहती हैं, “यह काम महिलाओं को अपने घर के काम काम करने और कमाने के दौरान अपने बच्चों की देखभाल करने की पूरी सहूलियत देता है।”

61 साल की पराड़कर जतब मात्र 10 साल की थीं, जब उनकी मां एक विज्ञापन देखा और लिज्जत के लिए पापड़ बनाने शुरू कर दिए। बड़े होने पर उन्होंने स्कूल जाने से पहले अपनी इस काम कई दिनों तक अपने मां की मदद भी की। पराड़कर याद करते हुए कहती हैं, “जब मैंने अपने स्कूल की परीक्षा पूरी की, उसके बाद बांद्रा शाखा के प्रमुख लीलाबेन, जहां मेरे परिवार और दोस्तों ने काम किया, उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं वहां पमेंट डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी लेना चाहती हूं।”

पराड़कर ने यह नौकरी ले ली। इस दौरान जब सेल्समैन तैयार पैकेटों को लेने के लिए आते थे, तो वह खातों को रखने और आपूर्ति श्रृंखला की निगरानी में शाखा प्रमुख की सहायता करती थीं।

इस बीच, लिज्जत, अभी भी काफी हद तक उसी तरह से काम करता है। वे अभी भी अखबारों के विज्ञापनों के माध्यम से महिलाओं की भर्ती करते हैं। हर कोई एक पापड़ बनाने वाले के रूप में जुड़ जाता है। फिर उसे प्रशिक्षित किया जाता है। बाद में पास के केंद्र से आटा उठाकर घर पर पापड़ बनाने और सुखाने का काम होता है। और अंत में उस पापड़ के बदले उन्हें पैसे का भुगतान कर दिया जाता है। बसें महिलाओं को केंद्रों तक ले आने-जाने के लिए फेरी लगाती हैं। अधिकांश प्रक्रिया में हाथ से काम किया जाता है।पराड़कर कहती हैं, ‘ हम परिचालन के इस पक्ष को नहीं छूते। अगर हम मशीनों का उपयोग करना शुरू करते हैं, तो हम इतनी सारी महिलाओं के लिए रोजगार नहीं पैदा कर पाएंगे।”

पराड़कर की तरह ही 44 वर्षीय मंजुला एस ने अपनी मां के साथ लिज्जत केंद्र में शुरुआत की। जब वह 27 साल की थीं, तब उन्होंने उनके लिए आधिकारिक रूप से पापड़ बेलना शुरू कर दिया था। वह कहती हैं कि यहां का माहौल सौहार्दपूर्ण है। महिलाओं में एकता है, सभी लोग मिलनसार और मददगार हैं।”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button